Thursday, January 21, 2010

कितनी भी सभ्य भाषा में तथ्य देकर लिखने की कोशिश करो, कुछ “खास” लोग विरोधी टिप्पणी सहन ही नहीं कर पाते

- सुरेश चिपलूनकर

“देखो भाईयों, ये “सज्जन” इस प्रकार की हरकत करते है, इनके संस्कार ऐसे हैं, मैं इन्हें एक्सपोज करता हूँ…” उस भाई को सजा मिल जायेगी, गालीगलौज करने वाला अपने “संस्कार” दिखा रहा है, आप अपने संस्कार दिखाईये ना!!! लेकिन किसी खास राजनैतिक विचारधारा की टिप्पणियाँ सिर्फ़ इसलिये नहीं लेना कि वह विरोधी टिप्पणी है, विशुद्ध तानाशाही है, और ऐसा कई ब्लॉग पर मैंने पाया है (यह मेरा निजी अनुभव है), कितनी भी सभ्य भाषा में लिखो, कितने ही तथ्य देकर लिखने की कोशिश करो, कुछ “खास” लोग विरोधी टिप्पणी सहन ही नहीं कर पाते, इसे कौन सी मानसिकता कहेंगे?

- सुरेश चिपलूनकर

संदर्भ: महाजाल पर सुरेश चिपलूनकर
लिंक: http://sureshchiplunkar.blogspot.com/2008/11/comment-moderation-and-word.html

1 comment:

डा. अमर कुमार said...


मॉडरेशन :
मॉडरेशन की तहज़ीब तो यह है कि, आप अशोभनीय (?) या गलत परिप्रेक्ष्य में दी गयी टिप्पणी उनको लौटा दें और आग्रह करें कि वह इसे सुधार दें, या अपने नज़रिये / आक्रोश को जॅस्टिफ़ाई करते हुये यह टिप्पणी पुनः प्रेषित करें । यह स्वस्थ परिसँवाद की परँपरा है, पर होता यह कि... अब जाने भी दीजिये ।
स्पैम की दुहाई अपने गले से नीचे नहीं उतरती, क्योंकि अपने 3 वर्ष से ऊपर के ब्लॉगिंग अनुभव में मुझे एक भी स्पैम नहीं मिला, जबकि मैंने मॉडरेशन कभी भी नहीं लागू किया, क्योंकि यह लोकोभिव्यक्ति का एक गला-घोंट सुविधावाद है । एक आम पाठक को जयकारा और साधुवाद ठेलने को यही तत्व बाध्य करता है । मॉडरेशन के हिमायती वर्ग का कोई भी मैय्या का सपूत ’ निंदक नियरे राखिये ’ का साहस नहीं रखता । अलबत्ता अनूप जी अवश्य इसके अपवाद हैं ।