
-ज्ञानदत्त पाण्डेय
हिन्दी सेवा का भ्रम नहीं पालना चाहता समीरलाल के बरगलाने से...सत्यनारायण की कथा का
कण्टेण्ट आज तक पता न चल पाया..इन कथाओं को सुनने जाने वाले अपनी छुद्र पंचायतगिरी में मशगूल रहते हैं...बड़ी थू-थू में-में हो रही हिन्दी ब्लॉगरी में... व्यक्तिगत आक्षेप ब्लॉग साहित्य का अंग बन गया..
.मैं तो हिन्दी सेवा की चक्करबाजी में नहीं पड़ता/लिखता...बहुत प्रसन्नता होगी जब लोग हिन्दी ब्लॉगरी को गुटबाजी, चिरकुटत्व, कोंडकेत्व आदि से मुक्त करने के लिये टिप्पणी-अभियान करें...सड़क किनारे के सार्वजनिक मूत्रालय सा...लोग अपनी दमित वर्जनायें रिलीज कर रहे हैं और कोई मुन्सीपाल्टी नहीं जो सफाई करे मूत्रालय की...
-ज्ञानदत्त पाण्डेय
संदर्भ: मानसिक हलचल
लिंक: http://halchal.gyandutt.com/2010/01/blog-post_03.html